154वीं


                                                                     



विगत दिनों में मुझे खादी खरीदने का अवसर प्राप्त हुआ। खादी की दुकान पर 'गांधी आश्रम' का बोर्ड लगा था। एक आयताकार काउन्टर था । पीछे मध्यकालीन युग की कुर्सी, अलमारीयों में खादी के थान, कोसा, साड़ियाँ और कुछ गद्दे रखे थे। शाम के 7 ही बजे थे कि काउन्टर के पीछे एक आदमी सुस्त झुका हुआ था। उसने टेरेलीन की शर्ट और स्ट्रेट लेंथ की पेंट पहनी थी। लेकिन बेच वो खादी रहा था। ठीक सामने खादी रंग की दीवार पर नॉन-वॉइलेन्स के सबसे बड़े इंफ्लुएंसर महात्मा गांधी की बड़ी-सी तस्वीर लगी हुई थी। तस्वीर के पीछे एक लंबी-सी गेहूँए रंग की  छिपकली चुप-चाप फोटो के गस्त लगा रही थी। जैसे ही कोई किट-पतंगा उसके पास से गुजर रहा था; तो छिपकली उसे चुप-चाप दबोच लेती थी और एकदम स्थायी भाव से बापू की फोटो के पीछे छुप जाती थी। वह दृश्य ठीक उसी प्रकार था जैसे- बड़े नेता, सियासतदार और बापू के तथाकथित चेले 2 October को हुलिया बदल कर बापू के 90 डिग्री के आदर्शों के पीछे छुप जाते हैं। शायद ऐसे ही लोगों के लिए अभिनेता शाहरुख ख़ान की खराब घड़ी पर लिखे गए Existential गीत की चंद लाइन- 'हर घड़ी बदल रही 'रूप' जिंदगी' पोएटिक जस्टिस करता है। बहरहाल, साल में 2 October और 31 January को ही बापू का सीजन चलता है। जो गांधीवादी विचार साल भर से गोदामों में सड़ रहे होते हैं वे मुरझाए व्यक्तित्वों की बैलगाड़ियों पर लद कर मंडियों में आ जाते हैं।   

                                                                           

कुछ ऐसी ही मंडियाँ बुद्धिजीवियों की बैठकें होती हैं। हाल ही में बुद्धिजीवियों की एक गोष्टी में मुझे गांधीजी के जीवन तथा उनकी प्रासांगिगता पर भाषण सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आर्थर क्लार्क के अनुसार बुद्धिजीवी वो EWS category (Elite weird section) के प्राणी हैं, जिसको उसकी बुद्धि की हैसियत से ज्यादा पढ़ा लिखा गया होता है। लीचेंबर्ग का कहना है कि कुछ लोग इतने बड़े बुद्धिजीवी हो जाते हैं कि वे लगभग किसी काम के नहीं रह पाते। देश में बुद्धिजीवियों का काम है कि वे देश कि  समस्या सुलझाने में मदद करें। अब सवाल यह है कि  बुद्धिजीवी कौन हैं? उत्तर यह है कि मैं हूँ और आप हैं। लेकिन इस देश की  समस्या यह है कि देश में समस्याएं अधिक हैं उसकी तुलना में बुद्धिजीवी कम हैं। खै़र, मेरी एक बुद्धिजीवी मित्र ने मुझसे सीधा सवाल किया। सवाल सीधा नहीं था, पूछने का ढंग सीधा था। 
उसने पूछा -'क्या हमारा देश गांधीजी के बताए मार्ग पर चल रहा है?'
मैंने उसे उत्तर दिया-' देश गांधी जी के रास्ते पर चल रहा है, दौड़ भी रहा है।'
देखिए! आज़ादी के बाद देश के हर शहर और नगरपालिकाओं की एक सड़क का नाम गांधी मार्ग रख दिया गया है। इससे ये सुविधा हो गई है कि शहर के लोग, बड़ी मात्रा में वाहन ,कुछ सीमित समझ के कुत्ते, कुछ अन्य जानवर, कुछ आदि. कुछ इत्यादि ये सभी गांधी मार्ग पर चल रहे होते हैं।कभी- कभी गांधी मार्ग पर चलने की इतनी होड़ होती है कि ट्रैफ़िक जाम तक हो जाता है। यदि नेता जी अपने भाषणों में कहते हैं कि हम गांधी जी के मार्ग पे चल रहे हैं तो वे झूठ नहीं कहते, वे वाकई चल रहे होते हैं। अगर आप देश की सभी गांधी सड़कों और मार्गों का योगफल निकालें तो यह बता पाएंगे कि देश प्रतिदिन कितने किलोमीटर गांधी जी के मार्ग पर चलता है।'  ये क्या कम है!! 
                                                                              


पूरे विश्व में बापू को महात्मा कहा जाता है। महात्मा का अर्थ सही अर्थों में क्या है इसे कोई नहीं बताता और यदि संधि विच्छेद से प्रत्येक शब्द का अर्थ निकलता तो चिड़ियाघर में केवल चिड़ियाएं रहती।दरअसल मेरी समझ में महात्मा का अर्थ होता है- जिसमे बोरियत सहन करने का अपार धीरज हो। साधारण मानव खीझ उठते हैं,और ऊब में माथे पर शिकन ले आते हैं। कुछ शरीफ़ व्यक्ति अपनी शराफ़त से भी बोर होते हैं। मैं रुपये में 50 पैसे भर की भी महात्मा नहीं हूँ। एक बोरियत को 3-4 घंटे बर्दास्त कर सकती हूँ, उसके बाद मेरा मानव रूप प्रकट होने लगता है। प्राचीनकाल में कई सारे महात्मा देश में हुए। गौरतलब है कि प्राचीनकाल कई मामलों में प्राचीन ही था। लोगों में बोरियत सहन करने का महात्मा गुण आम था। जैसे- एक महात्मा दूसरे को समझा रहे होते थे कि ब्रह्म क्या है और उसका माया के साथ क्या स्कैन्डल चल रहा है। ऊपर से जंगल का परिवेश अपने आप में किसी दर्शन से कम नहीं होता था। शेर या भेड़िया कब आपके व्यक्तित्व का राष्ट्रीकरण कर दे कह नहीं सकते । ऊपर से खोपड़ी चाटने वाली ब्रह्म और माया की बातें। कल्पना कीजिए कि इस धरती ने कब-कब कितनी बोरियत सही होगी?
वहीं बापू सभी महात्माओं से भिन्न हैं। वे जिद्दी हैं, दूरदर्शी हैं। ब्रिटिश हुकूमत की बोरियत को सहने के लिए संघर्ष का, संगीत का और सेन्स ऑफ ह्यूमर का प्रयोग करते हैं। वे बच्चों के साथ खेलते भी थे। बापू का मानना था की भारत की आज़ादी तब तक मुकम्मल नहीं हो सकती जब तक संघर्ष में संगीत न हो। जब वे सेकंड राउंड टेबल कोन्फ़्रेंस के लिए लंदन गए तो वे स्कॉटिश लोगों के साथ नाचे भी। अपनी फ़्रांस यात्रा के दौरान रोमी रोला से भी मिले और उन्हें Decompose हो चुके Beethoven की compose की गई 5 वीं सिम्फनी  बजाने का आग्रह भी किया। खै़र महानता अपना संदर्भ और समय दोनों साथ लेके आती है। लेकिन बापू कालजयी हैं। इन सब बातों का यही मतलब है कि बापू की आत्मा का जूस निकाल चुके लोगों की सोचालय से गांधीजी को जानने के इतर हमें खुद से उनको जानना निहायती ज़रूरी है।  
                                                                                

जब मैं स्कूल में पढ़ती थी, तब हमारे एक शिक्षक को नैतिक वाक्य रटवाने की बड़ी धुन थी। सैकड़ों कुओट्स उन्होंने हमें रटवाये थे, और उनका पूर्ण विश्वास था कि यदि हमनें नैतिक वाक्य रट लिए तो हमारी ज़िंदगी जरूर सुधार जाएगी। बहरहाल, हमारे शिक्षक ' ऑनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी' रटवाते-रटवाते स्कूल का फंड खा गए। उनका ये कार्य उसी तरह था-जैसे 'ऑनेस्टी (Honesty) में बेमानी से 'एच(H)' रहता है। बापू के भी नैतिक वाक्य हमे रटवायें गए, जिनका सच्चा प्रयोजन अब जाके मेरी समझ में आया है। जो इस प्रकार है:-
                                                                              

  • सत्य की राह पर चलना चाहिए:- सत्य के पास पहुँचने का एक ही रास्ता होता है कि तरह-तरह के सवाल करना। चाहे वो सत्य भगवान के पास हो या लोकतंत्र में हमारे सबसे बड़े नेता के पास हो। सवालों के साथ खड़े रहना सत्य के साथ खड़े रहने जैसा है। बापू सत्य के साथ तरह- तरह के सकारात्मक प्रयोग करते थे। वर्तमान  में न्यूज चैनल्स, सोशल मीडिया भी सत्य के साथ खूब प्रयोग करते हैं;और एक झूठनुमा सच पेश करते हैं। Layman की भाषा में हम जिसे फैक-न्यूज (fake news) कहते हैं। जिसका कार्य आँखों में धूल झोंकने के साथ-साथ, तरह- तरह की इमेज झोंकना भी होता है। बीते दिनों अखबार में एक Ad देखा । Ad Hero bikes का था। जिसमे एक मिलिट्री पर्सन की फोटो के साथ लिखा था-'Saluting the Hero behind the Heroes'. बताइए! कौन-से हीरो के पीछे कौन-सा Hero है? क्या सेना Hero bikes बना रही है? क्या Hero bikes ने सेना का प्रदर्शन अच्छा कर दिया? हमें तो  ये  भी नहीं मालूम कि सेना के जवान Hero पसंद करते हैं या TVS पसंद करते हैं या उन्हें बाइक से अच्छी स्कूटी लगती है। लेकिन अपने हित के लिए सेना का इमेज आपके आँखों में झोंक दिया जाता है। गौर करने वाली बात ये है कि यदि कोई व्यक्ति या कंपनी आपको अंधेरे का डर दिखाता है तो इसका साफ-साफ मतलब होता है कि वो आपको अपना इंवर्टरऔर टॉर्च बेचना चाहता है।
  • कला आत्मा की देन होती है, कला का सच्चा प्रयोजन जनोपयोग में है:- धन्य हो बनाने वालों का। कला कहाँ नहीं है। हर सड़े माल पर एक हसीन-सा लेबल लगा होता होता है। कला हमें लगातार ग्राहक बने रहने के लिए मजबूर करती है। मेरी एक कर्जदार है, मुझे उसका उधार चुकाना है। मेरी कर्जदार दोस्त क्या सुंदर पत्र लिखती है, कई बार पेमेंट करने को दिल करता है।आखिर कला का सम्मान करना हमारी परंपरा है। कला की किमत हम नहीं चुकाएंगे तो कौन चुकाएगा ? दिन प्रतिदिन कला की सुंदर वस्तुएं फैशन का रूप ले रही है। अपने देश में विचार व्यक्ति को सभ्य नहीं बल्कि दर्ज़ी व्यक्ति को सभ्य बना रहे हैं। मैं बड़े- बड़े चश्मों की कला पर मोहित हो रही हूँ। व्यक्ति के चश्में का साइज़ बड़ रहा है, पॉवर बड़ रहा है। लेकिन हमारी दृष्टि संकीर्ण होती चली जा रही है। 
                                                                              

  • प्रेम दुनिया की सबसे ताकतवर शक्ति है; प्रेम में दुनिया और भी खूबसूरत दिखाई पड़ती है:- बापू सही ही कहते हैं। प्रेम सार्थक होना चाहिए। बेमेल-प्रेम में इंसान एकदम अंधा हो जाता है। शुरू- शुरू में व्यक्ति एक-दम अंधा नहीं होता; पहले उसकी नज़र कमज़ोर हो जाती है। इसका प्रमाण यह है कि जिस व्यक्ति से वह प्रेम करता है वो धीरे-धीरे बहुत सुंदर लगने लगता है। जरूरत से ज्यादा महान लगने लगता है। इधर आँखों की रोशनी कम पड़ने लगती है उधर लड़के/ लड़की का चहरा और चरित्र ज्यादा प्रकाशमय हो जाता है। इस चौंधियाने की सी हालत में दुनिया बेहद हसीन दिखाई पड़ती है। यहाँ तक की प्रेम में इतनी शक्ति मालूम होती है कि भारत के बेरोजगार कवि जो अपने बैंक से FD(Fixed deposit) तक तोड़ नहीं पाते, वह डार्विन के विकासवादी सिद्धांत और न्यूटन के Escape velocity के सिद्धांत को लांघकर चाँद-तारे तोड़ने की बात करते हैं। और एक अल्लादीन के चिराग ने ये तक लिख डाला है कि -
ए खुदा हमने भी चाँद देखा है 
उसमें तो दाग़ है हमने तो बेदाग़ देखा है। 

 शायद ऐसे ही महान छायावादी कवियों को स्पेस की जटिलता पर लिखा गया Einstein का फार्मूला E= mc2 नहीं, बल्कि उसकी जगह E= MC STAN( Hip-hop का जाना-माना कुपोषित आर्टिस्ट ) समझ में आता होगा। सच तो ये है कि प्रेम में ऐसा लगता है मानो  यथार्थ के वातावरण में होली के सस्ते चाइनीज रंग छिड़क दिये गए हो।

अंत में एक बात और चाहे वो गांधीजी हो या ग़ालिब हो ,कोई भी आलोचना से परे नहीं हैं। आलोचना उतनी ही नैसर्गिक है जितना न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम। इनकी आलोचना काजिए। इनके विचारों से मुठभेड़ कीजिए। लेकिन पहले इन्हें जानिए, पढ़िए। आज के दौर में हमें 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटे गांधीजी से लेकर 1948 के नवाखोली में बैठे पॉलिटिकल ,स्पिरिच्वल,फिलोसोफिकल गांधीजी की यात्रा को समझना बेहद जरूरी है। जब में बापू को पढ़ती हूँ तो मैं एक विचार को नहीं पढ़ती बल्कि उन सभी विचारों को पढ़ रही होती हूँ जिन्होंने बापू को प्रभावित किया और बाद में बापू का प्रभाव जिन पर पड़ा। बापू को पढ़ना जॉन रसल, हेनेरी डेविड थोरो, रस्किन, लिओ टॉल्स्टॉय,मार्टिन लूथरकिंग जूनियर, नेल्सन मंडेला, और विनोव भावे को पढ़ने जैसा है।

                                                                     


फिर से वही सवाल- क्या देश महात्मा गांधीजी के बताए मार्ग पर चल रहा है? 
चलने का तो पता नहीं लेकिन देश खड़ा महात्मा गांधी के मार्ग पर ही है। सुस्त कदमों से ही सही लेकिन पूज्य बापू की तरह ही गांधीमार्ग पर चलने के साथ-साथ हमें खुद के भीतर की भी यात्रा तय करनी है। निदा फाज़ली के शब्दों में- 
रस्ते को भी दोष दें, आँखें भी कर लाल 
चप्पल में जो कील है पहले उसे निकाल।   
                                                            

 (पूज्य बापू और शास्त्री जी को श्रद्धांजलि)                                                                                                                                                                                                                                                                       _G

Comments

  1. No words for this knowledgeable update ..❤️👍

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  2. बहुत ही अच्छा, लेखन शैली अनोखी हैl👍
    अपने आस पास हो रही घटनाओं पर गौर करने की आपकी क्षमता अद्भुत है!
    इतना अच्छा लेख लिखने के लिए धन्यवाद, इस लेख से बापू के विषय में कुछ अन्य जानकारी मिली! बापू तो दिन मे एक दो बार याद आते ही हैं, कुछ खरीद दारी करते हुए 💵 लगता है आप ज्यादा ही Online transaction कर रहे हो💳
    विजय और उसके परिवार को पणजी गए आज 8 साल पूरे हो गए 🙏
    गाँधी जी और हमारे दूसरे PM को श्रद्धांजलि।

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  3. लेखन में निरंतर बदलाव हो रहा है..!! पहले और आज के लेखन में काफी सुधार है..!! Great keep it up.. और अपने प्रिय पाठको को ऐसे ही आनंदित करते रहिए..!!

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  4. क्या बात है दोस्त
    बहुत ही शानदार
    तू हर टॉपिक के स्टार्टिंग से ऐंड तक ज़रूरी प्वाइंट पर अपना और समाज का नज़रिया सांझा करती है।
    तेरी हर writing पढ़ने को एक्साइटेड रहती हूं dude
    Very nice 👍👍

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  5. बहुत ही प्यारे और सिंपल तरीके से हर नजरिए को लिखा है।। बहुत ही सुंदर लेखन शैली है।। ❤️

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