जीवन को कुरेदती हुई गणित

[ प्रिय पाठकों, इतिहास की अपनी स्मृतियाँ होती हैं और सभी स्मृतियों का अपना एक इतिहास होता है। इन्हीं स्मृतियों के ऐतिहासिक क्रम में गणित के खत्म न होते हुए व्याकरण पर बात करूंगी। यह लेख उन तमाम गणित से भाग रहे पाठकों के लिए मेरा ऋणशोध है; जो जीवन में गणित से भाग तो रहे हैं, लेकिन पहुंच कहीं भी नही रहे हैं। सनद रहे कि अपने वर्तमान पर लानत भेजने का मुझ जैसे युवा को वैसा ही अधिकार है, जैसे वृद्धों को अतीत की स्मृतियों में भावुक हो उठने का।] 


संशय! संशय! संशय!....इस असार-संसार में हमारा जन्म केवल गणित करने के लिए हुआ है, हम मनुष्य हैं और मनुष्य रूप में गणित के ग्राहक बने रहने के लिए अभिशप्त हैं। जब से होश संभाल है तब से निरन्तर कुछ न कुछ गणित करते जा रहे हैं। जन्म से ही हमारी इकाई देह में संख्यायें समाहित होती हैं। मसलन एक नाक, दो आँखें , अंगुलियों में मौजूद तीन जोड़, हृदय के चार चेंबरस आदि। वयस्क होने पे लगता है कि हम सभी लोग केवल संख्यायें हैं जिन्हें भाषणों से लेकर जनसंख्या रजिस्टरों में केवल बताया जाता है। फिर विद्यार्थी के रूप में लगता है कि गणित बहुत भारी चीज़ है, इतनी भारी कि हमारे चारों ओर लगने वाले वायुमंडलीय दबाव के अलावा भी गणितीय दबाव का बैरोमीटर हमारे कंधों पर होता है। फिर आगे जीवन में हम सामाजिक संबंधों में गणित की समीकरणों को सुलझाते-सुलझाते आखिरकार इतना उलझ जाते हैं कि कभी-कभी लगता है कि गणित करते-करते हमारे होश 'फिनिक्स के परिन्दे' की तरह उड जाएंगे और लौट के कभी नहीं आएंगे। तब एक कफन परचेस किया जाएगा, जो केवल सफेद रंग का होगा, सफेद रंग की मोनोटोनी को तोड़ने के लिए उसपे ना ज्यामिति (Geometry) का पैटर्न होगा और ना ही त्रिकोणमिति का कोई खूबसूरत-सा डिजाइन होगा। तब जाके इस गणित से मुक्ति मिलेगी जो लगातार अपना ग्राहक बने रहने के लिए मजबूर करती है। 


मैं इस देश के उन लाख कमजोर विद्यार्थीयों में से एक हूँ जो कभी मैथ्स में फेल हो जाने के डर से किताब को दीमक बनकर निगलने लगती और जब किताब को चट करने की क्षमता खत्म हो जाती तो एंजायटी बाहर आने लगती। मुझे लगता था कि गणित के पेपर के दिन कस्बे में बाढ़ क्यूँ नहीं आ जाती ? या पेपर कैन्सल क्यूँ नहीं हो जाता ? या मुझे Jaundice क्यूँ नहीं हो जाता ? कई बार  ईश्वर को याद करके 'विषय-विकार मिटाओ पाप हरो देवा' भजन भी गाया और सपने में कई बार आर्किमिडीज और पाइथागोरस की पीठ पे चड़ कर सूत्रों को छूने की कोशिश भी की। लेकिन प्रार्थना के बाद भी सब कुछ शून्य रहा। परीक्षा के समय दो खंभों के बीच ट्रेन की स्पीड के प्रश्न अक्सर पूछे जाते थे, अब प्रश्न बनाने वाले को कोई क्या बताए कि परीक्षा कक्ष में मेरी दो गिरती हुईं उम्मीदों के बीच आत्मविश्वास की ट्रेन की स्पीड कितनी होती थी। परीक्षा के दिनो मुझसे अक्सर पूछा जाता की मैथ्स का पेपर अच्छा हुआ? अब क्यूंकी दुनिया की किसी भी गलती पे दार्शनिक निसपत्तियाँ दी जा सकती हैं, तो मैं दार्शनिक भाव से बोल दिया करती कि "A piece of paper can't decide my future". बहरहाल 12 वीं का इम्तहान पास करने के बाद मैंने गणित की अर्थी उठाने, तेरहवीं और श्राद्ध तीनों कर देने की तैयारी कर ही दी थी, फिर होता वही है जो हुआ करता है। गणित के साथ चलने वाली जंग पे कभी ज़ंग नहीं लगता।12वीं के बाद फिर 3 साल गणित की कक्षा में मुझे अपनी हाजिरी लगानी पड़ी। 

विषय तो कई थे जिनसे मुझे चिड थी, लेकिन गणित का दुख दुखों में भी अलग था। दुख इस बात का कि पढ़ाने वाले हमारे गुरु अतिरिक्त गुरु गंभीर बने रहते थे। लगता था कि सिद्धांतों की पुनरावृति ने उनके जीवन से मनोरंजन ही खत्म कर दिया है। वो हर बार ग्रीक-वेरिएन्ट वाले किसी गणितज्ञ के नाम की जर्सी पहनकर हमे प्रश्न करवाते थे। मसलन एक बार अध्यापक ने हमे प्रूफ करवाया कि दो समानांतर रेखाएं इंफिनिटी (Infinity) पर कहीं जाकर मिलती हैं। अब इस परिकल्पना के बाद क्या सुनना बाकी रह गया था? यही की खून का रंग लाल नहीं पीला है या इंग्लिश डोनट (Donut) भारतीय मिठाई बालुसाई का अपभ्रंश रूप नहीं है?

अरे भाई! ये भी कोई सवाल हुआ। दो समांतर रेखाएं कैसे मिल सकती हैं? इसकी बुनियाद ही गलत है। कभी-कभी लगता है कि गणित इतना इंप्रेक्टिकल तरीके से पढ़ाया जाता है कि मैं कभी कल्पना ही नहीं कर पाती कि एक टंकी लगी है जिसमे एक इनलेट  से पानी भरा जा रहा है और एक नलके से पानी निकल रहा है। ऐसा कोई क्यों ही करेगा? इसी प्रकार यदि मैं  5 पेन में से 3 को खो देती हूँ तो मुझे गणित पे नहीं बल्कि अपने भूल जाने या खोजने की क्षमता पर संदेह होना चाहिए और उधार के प्रश्नों को लेकर मेरे भीतर हमेशा कान्फ्लिक्ट बना रहता कि विषय तो वह है जो सामान्य मानविकी में काम आए; लेकिन आम दुकानों के बाहर 'उधार सामाजिक संबंधों की कैंची है' का बोर्ड लगा रहता है और कक्षाओं में उधारी और ब्याज सिखाया जाता है। ये कैसा ज्ञान है ? इसी तरह हमारे टीचर हर बात पर हमें अनुपात बताते रहते थे, इस बहाने वे कभी दूध में पानी की मिलावट, तो कभी दालों में कंकड़ की ; तो कभी अल्कोहल में पानी की मिलावट करवाते थे। इन मिलावटी प्रश्नों के हल ने मुझे थोड़ा अनैतिक तो बना ही लिया था। मैंने एक दिन साहस जुटा के टीचर से पूछने का एफर्ट कर ही लिया, कि मिलावट तो हर चीज में है, बीज गणित (Algebra) में अंक गणित (Arthmatic) की मिलावट है, हमारे सच में झूठ की मिलावट है, आसमान से उगते हुए सूरज के लाल रंग में पीले रंग की मिलावट है, नींद में सपनो की मिलावट है।  बताइए इनके अनुपात को कैसे निकाले? वे हँसते हुए 'राग दरबारी' उपन्यास के किसी किरदार की तरह मुझे बोले कि "बेटा तुम्हारे विचार बहुत ऊँचे हैं, कुल मिलकर उनसे यही साबित होता है कि तुम बहुत बड़े गधे हो"। ख़ैर गधा संबोधन था या चेतावनी, लेकिन मुझे बुरा नहीं लगा क्यूंकी कुछ दिन पहले ही मैंने कृष्ण चन्दर की लिखी हुई सबसे सुंदर कहानी 'एक गधे की आत्मकथा' पढ़ी थी। बहरहाल, गणित की कक्षा में भाग लेना बड़ी मजबूरी होती थी वरना अधिक से अधिक लोग गणित की कक्षा से भाग लेना चाहते थे। 


अलग अलग कक्षाओं में मैने पाया है कि थोक के भाव के माफिक गणितज्ञ मिल जाते हैं। जिनके मुख पर गणितज्ञ होने की आभा टपकती रहती है। आखिरकार ये वे ही गणितज्ञ होते हैं जो संख्याओं में तो अच्छे होते हैं लेकिन अकाउंटेंट बनने लायक व्यक्तित्व का अभाव रखते हैं। जिनकी प्रश्न हल करने की क्षमता 5 प्रश्न प्रति मिनट होती है। आप बस दर्शक दीर्घा में बैठकर पूरे पीरियड में उन्हें गालियाँ दे रहे होते हैं या फिर विस्मयादिबोधक चिन्हों से भर जातें हैं। इन महान गणितज्ञों को देख कर हमेशा मेरे मुंह से एक ही बात निकलती - 'वाह! भारत के गणितज्ञ साथियों तुमने पैथागोरस से लेकर रामानुजन तक का सफर एक ही पीरियड में कैसे पूरा कर लिया?'
कभी-कभी मुझे लगता है कि इन्हीं कक्षाओं में से अगले यूक्लिड (Euclid) और हाइपेथिया (Hypatia ) निकलेंगे। लेकिन इनके गणित का विन्यास इतना सीमित होता है कि ये बालक-बालिकाएं सामान्य मानविकी में 19-20 के फर्क को जान ही नहीं पाते। आत्मविश्वास और अतिआत्मविश्वास या फिर संतरा और कीनू के बीच फर्क तो छोड़िए, इन्हें आम दुकानों में मिलने वाले गुटखे और पान मसाले  में 19 और 20 का फर्क पता ही नहीं होता। इन फर्जी गौरव ओड़े हुए गणितज्ञों के गणित को देखकर धीरे-धीरे मैं ऊब गई हूं। अब मुझे लगने लगा है कि गणित एक त्रासद सुंदर अनुमान है; तो मैंने मान लिया है कि हमारा दूधवाला 'जगत' एक असली महान गणितज्ञ है जो न गणितज्ञ होने का गौरव ओढ़े हुए है और प्रेक्टिकली दूध में पानी की ठीक-ठीक मिलावट कर देता है और पता भी नहीं लगता।

कहा जाता है कि मानवता और गणित का विकास साथ-साथ ही हुआ है और दोनो आपस में इतना गुथ गए हैं कि इन्हे आप अलग नहीं कर सकते। जीवन में चीजों को समझने के लिए गणित से अच्छी कोई चीज नहीं। आप पाएंगे की तमाम गणितज्ञ  दार्शनिक भी बने क्योंकि जीवन भी एक गणना ही है। मसलन, हमारे मस्तिष्क में हर समय एक कैलकुलेटर लगा होता है जो हमारी भाषा का जोड़ और घटाना कर रहा होता है। यही हमारे सामाजिक संबंधों का गणित होता है। इसीलिए सामाजिक संबंधों की गणना के लिए चीजों को ब्लैक एंड व्हाइट में नहीं बल्कि दशमलव में देखने की जरूरत होती है। वहीं हम कला के आधार स्तंभ संगीत को देखें तो वह भी गणना ही है; ताल और सुरों के गणितीय विन्यास के ही आधार पर संगीत तारीफ़ या चप्पल दोनों चीजों को आकर्षित करता है। इसी प्रकार दिनचर्या में टाइम और कोऑर्डिनटेस पर भागना भी गणना ही है। जीवन इसी प्रकार का एक अपठित और अनसुलझी गणना ही है। मुझे कभी- कभी इस विषय पर ताज़्जुब भी होता है कि जिस विषय से मैं इतना भागती थी , अब उसी विषय के आस-पास मैं लगातार घूम रही हूं। जब भी पॉलिटिकल साइंस की किताब के हर पेज पर फुदकने वाली लोकतंत्र नाम की चिड़िया को जानने की कोशिश करती हूं तो घूमफिर के मुझे त्रिकोणमिति ही याद करनी पड़ती है। जिसमे अंत में लेफ्ट हैन्ड साइड (LHS) और राइट हैंड साइड(RHS) को बराबर करना पड़ता है और कुछ मायनों में डेमोक्रेसी प्रैक्टिस करते समय इसी  लेफ्ट (Left) और राइट (Right) के बीच मेरे साथ ,देश का लोकतंत्र भी लगातार संतुलन बना रहा होता है। 

जीवन के गलियारे में एक बिम्ब सवाल की शक्ल में आ खड़ा हो रहा है। अब देखिए, जीने के लिए धन चाहिए, धन के लिए नौकरी चाहिए और नौकरी के लिए गणित का पेपर। ऐसी स्तिथि से कब तक भागेंगे ?  इन तमाम उलझनों से थक कर; मैं एक साल से ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि मेरी गणित की परीक्षा हमेशा के लिए टल जाए या पेपर ही ख़त्म हो जाए। और देखिए ! ठीक इसी समय अब जाके मेरी प्रार्थना पूरी हुई है, सरकार ने मुख्य परीक्षा से गणित का पूरा पेपर ही हटवा दिया है। एक साल बाद मुझे विज्ञान का एक कांसेप्ट प्रेक्टिकली समझ में आया है कि 'ध्वनि की गति' (speed of sound)  'प्रकाश की गति (speed of light)' से काफी सुस्त होती है भगवान तक मेरी प्रार्थना आने-जाने में एक साल जो लग गया। इस खुशखबरी में दो महान दार्शनिक मुझे याद आ रहे हैं  एक लाओत्से (Laozi ) और दूसरे  हमारे गाँव के बड़े चाचा जी जो  कह गए कि ' जो होता है ठीक ही होता है और जो गलत है वो हो ही कैसे सकता है।'  रही बात 'जीवन एक गणित है'  कि तो चिंता का विषय ये है कि मुझ जैसे लोग जो गणित में कमजोर हैं वे आगे कैसे बढ़ेंगे?? लेकिन गणित में  कुछ नावें धारा के प्रतिकूल (upstream )भी चलती हैं। जीवन गणित के प्रति धीरे-धीरे अनुकूल हो ही जाएगा। क्यूंकी हमारे चारों तरफ रोज ना जाने कितनी चीजें घटित होती रहती हैं। ज़िंदगी में रोज ही एक नया टरबुलेंस आता रहता है; एक विद्यार्थी होने के नाते अभी लगता है कि गणित भी एक टरबुलेंस है। जो कि ऐसा मालूम होता है जैसे बस यही सबसे बड़ी चीज है। लेकिन भविष्य के छोर पर जब आप गणित की परीक्षा पास कर चुके होंगे तब धीरे-धीरे शाम ढलेगी , हफ्ते गुजरेंगे और यही उपद्रव अपनी अहमियत लिए समय के गुब्बार में कहीं खो जाएगा। 


_G


Comments

  1. गणित, जीवन का भूला बिसरा खौफ़ 😵
    Nice work 👌👌
    I hope you'll keep writing.

    ReplyDelete
  2. Shandaar satire!! Behad hi relevant!! Aise hi likhte raho.

    ReplyDelete
  3. Very nice shankhi di, aise hi likhte raho. ❤️

    ReplyDelete
  4. Very Relevant!! Keep writing sankhi. Bahut hi achcha likha hai.❤️

    ReplyDelete
  5. Ohhh wow ye toh me hu😂😂
    Mera bhi yhi haal hai
    Keep writing didi👍🏻❤

    ReplyDelete
  6. Waah sankhi di. Yeh blog toh mere life se inspired hai🙃. keep writing satires. ❤️.

    ReplyDelete
  7. Bahut hi shandar apne maths aur jindagi ki milawat ko jis tarike se smjaya hai m khud ab in dono ko alag nhi kr pa rha hu bahut khoob aise hi shandar likhte rho

    ReplyDelete
  8. कुछ भी करलो,, गणित एक‌ ढीट बालक के समान है, जीवन में रह रह के मुहं दिखाएगा ही।

    ReplyDelete
  9. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  10. Now that time I love maths
    But ek time ye khauf mere under v tha maths ko lekr,
    I think 95% logon k is common Darr ko teri ye realistic writing totally connect krti h or kahi sochte honge ki ye unki khud ki story hai. dude
    Very nice ❤️😍😍
    Itni tareef kaafi hai ya or kru 😂😂😂 teri tareef mujhse nhi hoti because you are my जिगरी यार।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

AALAS AUR OVERTHINKING kA DARSHAN

DECEMBER: A CHAPTER OF ENDING AND BEGINNINGS.