आषाढ़ के तीस दिन

 {प्राक्कथन फिर एक बार फिर से वही शुरुआत। मैं नहीं जानती की आप क्या समझ रहें हैं कि पलाश बाबू कौन हैं? आप बस सोचते हैं कि वे इस लेख में एक निर्धारित इकाई हैं। नायक, प्रस्तुतकर्ता या कुछ और। यद्यपि  पलाश बाबू एक काल्पनिक किरदार हैं ;लेकिन पलाश बाबू के संबंध में इतना कहना काफी होगा कि सड़क के फुटपाथ पर जिस आदमी से अचानक आप टकरा जाते हैं, वो आदमी पलाश बाबू है। आप सिर्फ घूर के उन्हें देख लेते हैं; उसके अलावा आप उनसे मतलब नहीं रखते। क्यूंकी जाहिर सी बात है कि पलाश बाबू भी आपसे मतलब नहीं रखते। टकराने के क्षण में आप पलाश बाबू के लिए वही होते हो जो पलाश बाबू आपके लिए। इंसानी सभ्यता के होने के नाते आप में और पलाश बाबू में कुछ समानता हो सकती है। वही समानता आप में या किसी-और में ;  किसी और में  या मुझमे भी हो सकती है।  इसीलिए पलाश बाबू जिस जगह बैठे हैं, वहाँ उनकी जगह आप भी हो  सकते थे। बहरहाल इस गणित की पहेली में कुछ नहीं रखा है। बात इतनी सी है कि विभाजित होकर पलाश बाबू किसी न किसी अंश में आप में से हर एक व्यक्ति में हैं।}

शहर के एक पॉश इलाके में पलाश बाबू अकेले रहते हैं। मैं पूछती हूँ "पलाश बाबू क्या कर रहे हैं?" 
जवाब देते हैं " बैठे हैं।"
सुबह पूछती हूँ तो बैठे हैं। दोपहर को पूछती हूँ तो बैठे हैं। शाम को पूछती हूँ तो भी बैठे हैं।
आज मैंने सवाल बदला: " कहिए पलाश बाबू, बैठे हैं क्या?" 
वे बोले " भैय्या,और क्या करें ?"
अब मैं क्या बताती कि और क्या करें!
मैंने कहा,"आप ही सोच लीजिए कि क्या करें।"  
उन्होंने जवाब दिया " सब सोच लिया है। अब मैं बैठकर घास खोदूंगा।"
दरअसल, अंग्रेजी में इसी क्रिया को ' ग्रास रूट लेवल की रिसर्च ' करना कहा जाता है। पारसाल पलाश बाबू ने पर्यावरण विज्ञान में मास्टर्स किया था। इस साल से रिसर्च शुरू कर रहे हैं, और उनके रिसर्च का शीर्षक ' बाढ़' है। आयरनी देखिए, कि पलाश बाबू को पानी से बेहद डर लगता है। जैसे किसी-ना-किसी को कॉकरोच , छिपकली या इन्जेक्शन से डर लगता है। जैसे मुझे भी ऊँचाई से अकारण का डर लगता है। बहरहाल,पानी के डर के कारण वे  सावन के मौसम से बच कर जीते हैं। इसीलिए बारिश आने से पहले वे बारिश से बचने की पूरी तैयारी कर देते हैं।यहाँ तक की पलाश बाबू इस मौसम में बनने वाली  'घेवर' नामक मिठाई से भी दूर रहते हैं।  बारिश के पानी पर आर्किमिडीज़ उनके आज भी उनके अवैतनिक सलाहकार हैं। उनकी राय में बारिश आ जाने से पानी को भी पाऊँ लग जाते हैं। बारिश में गलियाँ पानी के साथ कुछ दूर तक भागती हैं और  फिर लौट आती हैं। जब बारिश शुरू होती है तब वातावरण में कुछ नहीं होता सिवा बारिश होने के। आदमी और पेड़ जहाँ हैं वहीं पर खड़े रहते हैं सिर्फ पृथ्वी घूम जाती है। उस आशय की ओर जिधर पानी के चलने की क्रिया का रुख होता है। 

(1)

विशेषज्ञ की हैसियत से पलाश बाबू ने मुझे बताया कि उत्तर भारत में हर साल बाढ़ आती है। कोई बुलाता नहीं फिर भी आ जाती है। ठीक गर्मियों की छुट्टियों में बुआ जैसी। आती है और पूरा घर तहस-नहस कर जाती है। सबको पता होता है कि वह आने वाली है; पर कोई कुछ नहीं कर सकता। अजीब-सी मजबूरी है। बाढ़ अब घर का एक सदस्य बन चुकी है। पहले एक हफ्ते ये शोर मचता है कि मीडिया कवर नहीं कर रही, फिर जैसे-तैसे मीडिया कवर करती है तो लोग डोनैशन के लिंक बनाना शुरू कर देते हैं और जब उससे भी बोरियात महसूस होने लग जाए; तो अनुपम मिश्र का "तैरने वाला समाज डूब रहा है' नामक वो लेख इंटरनेट पर बाढ़ की तरह फैलने लगता है। बाढ़ पर एक ही ढंग का लेख लिखा गया है तो जाहिर-सी बात है वही छापेंगे। नया थोड़ी ही कुछ लिखेंगे। वे भी बेचारे अब नहीं रहे। लेकिन ये बाढ़ वहीं की वहीं है। 
इस वर्ष भी मूसलाधार बारिश ने नदियों को आदमखोर बना दिया है। यद्यपि जल ही जीवन है, आज यही जल जीवन का गला दबोचे अट्टाहास कर रहा है। नदीयों की बाढ़ ने पिछले सारे रिकार्ड के साथ-साथ घर के गेट, बॉउन्ड्री वॉल, कार के बोनट और ना जाने क्या-क्या तोड़ डाला है। जल संस्थान की पाइप लाइन को छोड़कर शहर और कस्बों के चारों ओर जल ही जल है। यूँ तो सावन मल्हार, सुहाना मौसम लेकर आता है; किन्तु अपने प्रदेश में यह भूस्खलन, जल-जमाव और बर्बादी लेकर आता है। बरसात अब हिन्दी फिल्मों के रिमझिम तराने नहीं सुनती बल्कि उफनती नदी, नालों का खौफ़नाक शोर सुनती है। जिसे सुनकर मनमयूर नाचने के बजाय जान हथेली पर रख भागने लगते हैं। 
                                                                    
(2)

पलाश बाबू ने वर्तमान का संज्ञान देते हुए बताया कि- इस साल फिर से बाढ़ आयी है। यमुना नदी में।गौरतलब है कि यमुना में बाढ़ नहीं आई है। हमने यमुना की ज़मीन पर जो घर बनाए हैं, उन घरों में यमुना आई है। बीते समय यमुना नदी ने दिल्ली और हिमांचल प्रदेश के दर्शन किये  हैं, और दिल्ली और हिमांचल  ने  भी यमुना के दर्शन किये हैं। जिस नदी के अस्तित्व को लेकर प्रदेश बेखबर हो चुके थे आज वो ही नदी इन प्रदेशों की खबर ले रही है। समय की सारी अवधारणाओं को ध्वस्त करते हुए अपनी अव्यवस्थाओं से परे प्रदेश के लोग लाचार सरकार की तरफ नहीं बल्कि पानी की तरफ देख रहे हैं। पानी कितना कम हुआ? पानी कितना आ गया ? आदि-आदि। फ़र्क इतना है कि पहले लोग देखते थे अब बाढ़ में व्लॉग और सेल्फ़ी खींचते हैं। अब बाढ़ आपदा नहीं महज एक खबर और Hashtag बन कर रह गई है। लोग एक बाढ़ की तुलना दूसरी बाढ़ से करने लगते हैं। मानो उनके बच्चे हों। यही पैटर्न हर  साल बेरहमी से दोहराया जाता है।                                                                              
                                                                                   
(3)

एक सरकारी चुप्पी के बाद पलाश बाबू ने फिर कहा- "इतिहास और वर्तमान के नेताओं को सीधे खारीज करना बेहद आसान होता है। उनके सामने रखी व्यवस्था की दोधारी तलवार को कोई नहीं समझता। जैसे कि सरकार को डर लगता है कि अगर उन्होंने काम कर दिया तो लोग वोट देना बंद न कर दें। क्यूंकी वोट तो काम ना करने वाले को ही मिलते हैं। सब जनता के प्रतिनिधि यही सोचते हैं कि  पहले उन्हें काम करने दो। फिर हम करेंगे और वैसे भी काम करने में पहल कैसी? 
और आपदा को अवसर में बदलना ही तो अच्छे नेता का कार्य होता है।  हालांकि आपदा-आपदा में भी फ़र्क होता है। जैसे सूखे और बाढ़ में जमीन-आसमान का फ़र्क होता है। दोनों ही आपदाएं जमीन पे आती हैं लेकिन सूखे में मंत्री जी जमीन से दौरा करते हैं; बाढ़ के समय मजबूत सिना कर हेलिकॉप्टर से नजारा देखते हैं। हालांकि सरकार आपदा से निपटने के लिए 'ठोस कदम' जरूर उठाती है। अब कदम जोकि ठोस होते हैं यानी भारी होते हैं। इस कारण उठ नहीं पाते। अगर 'कदम हल्के' होते तो उठ जाते।
सिलसिलेवार पलाश बाबू ने रंगनाथ जी( जो की नेता हैं।) के साथ वार्तालाप का संज्ञान दिया। रंगनाथ जी से पलाश बाबू ने कहा कि -'आप ये ठोस कदम क्यूँ उठाते हैं? हल्के कदम उठाइए।'
रंगनाथ जी बोले 'अरे भाई ,कदम हल्के ही होते हैं।'
पलाश बाबू फिर बोले- 'तो  उठाते क्यूँ नहीं?'
रंगनाथ  बोले- 'नहीं उठाने से ही हल्के कदम ठोस लगते हैं।'  
बाकी यही सिस्टम चलता रहता है। 
फिर कौन कहता है कि सरकार झूठ बोलती है? आज अपने ही प्रदेश को देख लो, इस जुलाई में प्रदेश की राजधानी और रुड़की 'इटली का वेनिश' नजर आने लगी है। सरकार का वादा था कि घर-घर तक पानी पहुँचा देंगे और नदी, झीलों और झरनों को रीवाइव कर देंगे। देखिए! कर दिया ना! आज सावन के अंधों को चारों तरफ हरा-भरा भले ही ना दिखे लेकिन हलाहल पानी जरूर दिख जाएगा।"   
                                                                          
(4)

"वैसे हम कर भी क्या सकते हैं? कुदरत का खेल है सब। हमने थोड़ी ही कोई बाढ़ जैसी स्तिथि पैदा की है। ज़मीन  पर कब्जा नहीं करेंगे तो रहेंगे कहाँ? पहाड़ों को नहीं काटेंगे तो रेल बनाएंगे कहाँ? रेल तो बहुत ज़रूरी है। दो-चार साल रेल से जाएंगे फिर अपनी गाड़ी होगी तो बढ़िया तेल जलाएंगे। अपनी सहूलियत के लिए पूरा वन तो काट ही सकते हैं। बाकी एसी,गीजर तो छूटेगा नहीं। मैं तो नहीं रह सकता। पेड़ लगा सकता हूँ लेकिन आलस आता है। सॉरी नेचर!( यह बात पलाश बाबू ने बिना कटाक्ष के ही बोली थी)। 
फिर उन्होंने कुछ धार्मिक विद्वानों का सहारा लिया और मनुष्य के आलसी नेचर को जस्टिफ़ाई करने की दलील पेश की। कहने लगे कि- उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। तो उसकी मर्जी के बिना चोरी भी नहीं होती होगी। मतलब वही चोरी करवाता है और वही पुलिसमैन से गश्त दिलवाता है। तो फिर इस दुनिया में आम इंसान के लिए करणीय क्या और अकरणीय क्या?
आपदा के समय प्रदेश की आज की स्तिथि के दो कारण हैं। केवल दो कारण। पहला- ना आप कुछ कर सकते हैं। दूसरा- ना मैं कुछ कर सकता हूँ; और जो करते हैं वे वही करते हैं जो हुआ करता है।"

खैर,अपना प्रदेश तो देवभूमि है। यहाँ पर हर एक घटना 'ऐक्ट ऑफ गॉड' होती है। एक शायर ने सही ही कहा है-
यहाँ भी खुदा, वहाँ भी खुदा, जिधर भी देखूँ हर तरफ खुदा। ( एक समय के लिए मुझे लगा कि शायरी रेलवे की खुदाई पर है, लेकिन शीघ्र ही मुझे पता लगा कि वे ईश्वर की बात कर रहे थे। खैर,अपनी-अपनी राय का सवाल है।)
वैसे भी आम लोगों के लिए ग्लोबल वार्मिंग, कलाइमेट चेंज सब लफ्फेबाजी है। शिकायती किताब के कथा-साहित्य में योगदान देकर पलाश बाबू ने टीवी चलाया। पहले ही चैनल पर आपदा राहत कार्य देख कर वे बोले-
"अरे वाह! क्या इंसानियत दिख रही है इस विडिओ में, एक लड़का नाव में बैठकर कुत्ते को बचाने निकला है। इंसानियत जिंदा है अभी भी।"(ये सब देख कर मेरी आँखों के सामने वेदना का फोटोग्राफ नहीं, बल्कि वेदना का कार्टून नजर आने लगा।) 
वे मुझे देख कर बोलने लगे की " देखिए!अपना देश कितना महान है।"
मैंने कहा " इसमे कोई शक नहीं। अब आप और हम सब महान हैं तो देश तो महान होने को रहा।" 
वे फिर बोले  "अगले चैनल पे क्या है? जरा चेंज करो! Succession  का चौथा सीजन देख लेते हैं। ये शायद अगले साल न आए। बाढ़ तो आती-जाती रहेगी।"      


[Photo Credit (1)&(4 )- Joint Magistrate Roorkee.] 

_G 

Comments

  1. I seriously don't have enough words for you🫡👌🏻😊

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  2. क से काग़ज़ के फूल, क से कटाक्ष, क से कुटिल बहुत बेहतरीन काम किये हैं आप पलाश बाबू। लगता है, इस कुदरत की बरसात को आपने अच्छे से जिया है।
    शब्दों का चयन करने की अद्भुद शक्ति।
    अपनी इस शक्ति को किसी गदेरे के सुकून में मत बहा देना।

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  3. बहुत ही बेहतरीन व्यंग। शीर्षक का चयन शानदार है। भाषा शैली और लेखन शैली बहुत सुंदर है।आपने समाज, राजनीति और पर्यावरण को बहुत अच्छे से जोड़ा है। कहीं न कहीं आपमें मुझे पलाश बाबू नज़र आते हैं।

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  4. Very hilarious satire shankhi.😅tumhare sense of humour ka kya kehna😅.Every paragraph reflects your command on language and your vision. Very funny and mind-boggling lines between your paragraph are so catchy. Kamaal hai!!

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  5. Bhut hi acha likha h apne..keep it up!!

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  6. बहुत ही शानदार है ये किरदार काल्पनिक हमारे पलाश बाबू
    एक व्यक्ति के जरिए तूने राजनीति और पर्यावरण की स्थिति को जोड़ा और उसे व्यंग के रूप मे सबके सामने प्रस्तुत
    किया।
    मुझे खुशी होती है तेरी हर writing पढ़ने मै क्यूंकि तेरी लिखी हुई हर बात लॉजिकल होती है और सच्चाई होती है उसने

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  7. Very Good satire shankhi di. I'm very thankful to you ki aapne padh ke sunaya. Keep it up!❤️

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  8. बहुत ही शानदार तरीके से आपने सब कुछ समझा दिया और जिस तरीके से राजनीति को बाढ़ से जोड़ा है बहुत अच्छा है।।। मैं इसे जरूर सुनना भी चाहूंगा आपसे 😍😍

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