आषाढ़ के तीस दिन
{प्राक्कथन: फिर एक बार फिर से वही शुरुआत। मैं नहीं जानती की आप क्या समझ रहें हैं कि पलाश बाबू कौन हैं? आप बस सोचते हैं कि वे इस लेख में एक निर्धारित इकाई हैं। नायक, प्रस्तुतकर्ता या कुछ और। यद्यपि पलाश बाबू एक काल्पनिक किरदार हैं ;लेकिन पलाश बाबू के संबंध में इतना कहना काफी होगा कि सड़क के फुटपाथ पर जिस आदमी से अचानक आप टकरा जाते हैं, वो आदमी पलाश बाबू है। आप सिर्फ घूर के उन्हें देख लेते हैं; उसके अलावा आप उनसे मतलब नहीं रखते। क्यूंकी जाहिर सी बात है कि पलाश बाबू भी आपसे मतलब नहीं रखते। टकराने के क्षण में आप पलाश बाबू के लिए वही होते हो जो पलाश बाबू आपके लिए। इंसानी सभ्यता के होने के नाते आप में और पलाश बाबू में कुछ समानता हो सकती है। वही समानता आप में या किसी-और में ; किसी और में या मुझमे भी हो सकती है। इसीलिए पलाश बाबू जिस जगह बैठे हैं, वहाँ उनकी जगह आप भी हो सकते थे। बहरहाल इस गणित की पहेली में कुछ नहीं रखा है। बात इतनी सी है कि विभाजित होकर पलाश बाबू किसी न किसी अंश में आप में से हर एक व्यक्ति में हैं।}
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विशेषज्ञ की हैसियत से पलाश बाबू ने मुझे बताया कि उत्तर भारत में हर साल बाढ़ आती है। कोई बुलाता नहीं फिर भी आ जाती है। ठीक गर्मियों की छुट्टियों में बुआ जैसी। आती है और पूरा घर तहस-नहस कर जाती है। सबको पता होता है कि वह आने वाली है; पर कोई कुछ नहीं कर सकता। अजीब-सी मजबूरी है। बाढ़ अब घर का एक सदस्य बन चुकी है। पहले एक हफ्ते ये शोर मचता है कि मीडिया कवर नहीं कर रही, फिर जैसे-तैसे मीडिया कवर करती है तो लोग डोनैशन के लिंक बनाना शुरू कर देते हैं और जब उससे भी बोरियात महसूस होने लग जाए; तो अनुपम मिश्र का "तैरने वाला समाज डूब रहा है' नामक वो लेख इंटरनेट पर बाढ़ की तरह फैलने लगता है। बाढ़ पर एक ही ढंग का लेख लिखा गया है तो जाहिर-सी बात है वही छापेंगे। नया थोड़ी ही कुछ लिखेंगे। वे भी बेचारे अब नहीं रहे। लेकिन ये बाढ़ वहीं की वहीं है।




I seriously don't have enough words for you🫡👌🏻😊
ReplyDeleteक से काग़ज़ के फूल, क से कटाक्ष, क से कुटिल बहुत बेहतरीन काम किये हैं आप पलाश बाबू। लगता है, इस कुदरत की बरसात को आपने अच्छे से जिया है।
ReplyDeleteशब्दों का चयन करने की अद्भुद शक्ति।
अपनी इस शक्ति को किसी गदेरे के सुकून में मत बहा देना।
बहुत ही बेहतरीन व्यंग। शीर्षक का चयन शानदार है। भाषा शैली और लेखन शैली बहुत सुंदर है।आपने समाज, राजनीति और पर्यावरण को बहुत अच्छे से जोड़ा है। कहीं न कहीं आपमें मुझे पलाश बाबू नज़र आते हैं।
ReplyDeleteVery hilarious satire shankhi.😅tumhare sense of humour ka kya kehna😅.Every paragraph reflects your command on language and your vision. Very funny and mind-boggling lines between your paragraph are so catchy. Kamaal hai!!
ReplyDeleteBhut hi acha likha h apne..keep it up!!
ReplyDeleteबहुत ही शानदार है ये किरदार काल्पनिक हमारे पलाश बाबू
ReplyDeleteएक व्यक्ति के जरिए तूने राजनीति और पर्यावरण की स्थिति को जोड़ा और उसे व्यंग के रूप मे सबके सामने प्रस्तुत
किया।
मुझे खुशी होती है तेरी हर writing पढ़ने मै क्यूंकि तेरी लिखी हुई हर बात लॉजिकल होती है और सच्चाई होती है उसने
Very Good satire shankhi di. I'm very thankful to you ki aapne padh ke sunaya. Keep it up!❤️
ReplyDeleteGreat.... I loved it....
ReplyDeleteबहुत ही शानदार तरीके से आपने सब कुछ समझा दिया और जिस तरीके से राजनीति को बाढ़ से जोड़ा है बहुत अच्छा है।।। मैं इसे जरूर सुनना भी चाहूंगा आपसे 😍😍
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