भाग 1: 'IT'S LIKE GRAVITY AND GRAVY OF EMOTIONS'
10 March 2023
प्रेम को कितनी ही बार लिखने की कोशिश करती हूँ, पर ठीक प्रेम लिखने से हमेशा रह जाती हूँ। ठीक-ठीक प्रेम लिखना उतना ही मुश्किल है जितना कि एक दिन उपवास रखकर भुखमरी के विषय में लिखना या आँखों में पट्टी बांध कर अंधे की रातों में बिजली का चित्रण करना या फिर स्पेस में ब्लैक होल की गुत्थी को ठीक-ठीक लिख पाना। स्पेस से याद आया कि महान वैज्ञानिक आइन्सटाइन कहते थे कि 'प्रेम में पड़ने के लिए ग्रैविटी कि आवश्यकता बिल्कुल भी नहीं होती'। शायद इसी प्रेरणा से गुलजार ने प्रेम में 'आज कल पाऊँ जमीन पर नहीं पड़ते मेरे' लिखा होगा। गौरतलब है कि न्यूटन कैसे ग्रैविटी ऑफ सिचूऐशन (gravity of situation) को नहीं समझ पाए?

खैर,मेरा और ग्रैविटी का बड़ा ही नेक रिश्ता है। जो मुझे हमेशा जमीन से जुड़ा महसूस करवाता है। कहा जाता है कि प्रेम आपको प्रेमसागर में तैरना (flotation) सिखाता है और डूबना भी; किन्तु सच्चा प्रेम आपको उड़ना(levitation) सिखाता है।आश्चर्य की बात यह है कि बिना रेडबुल (red bull) और पर्क चॉकलेट(perk chocolate) खाए लवबर्ड्स(love birds) और cupids सदियों से उड़ रहें हैं।वैसे भी प्रेम के flotation और levitation के बीच के टाइम और स्पेस में यथार्थ झूठा और कल्पना सच्ची होती है।
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| (हवा में उड़ते नायक और नायिका) |
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| (90 के दशक में लवबर्ड्स का चित्रण करते हुए नायक नायिका) |
मैं किस प्रेम के विषय में बात कर रही हूँ? ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है।सुनी-सुनाई बात बताऊँ तो प्रत्येक प्राणी अपने-अपने तरीके से प्रेम करता है और संसार में एक सैकड़े से भी अधिक प्रकार के प्रेम हैं, लेकिन प्रेम तो प्रेम ही है।इन सबकी विशेषता लगभग समान है। Schrodinger के अनुसार प्रेम अंधा होता है, हाइगेनसबर्ग कहते हैं कि पहली नज़र में भी प्रेम होता है, आश्चर्य की बात यह है कि प्रेम अंधा भी है,और पहली नजर में भी होता है। किन्तु बिना दृष्टिकोण के प्रेम कैसे सार्थक हो सकता है? मेरा मानना है कि प्रेम तभी अंधा हो सकता है यदि वह पहली नज़र में हो।चूँकि मेरे पसंदीदा ए.आर रहमान का कहना है कि प्रेम में मान-अपमान कुछ भी नहीं। तदनुसार लवबर्ड्स जो प्यार में उड़ते भी हैं,और अंधे भी हैं, और कभी-कभी देखते भी हैं, उन्हे 'उल्लू' कहलाने में बिल्कुल भी अपमान नहीं लगना चाहिए।
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प्रेम को कैसे समझा जाए? प्रेम इस दुनिया का सबसे अलौकिक विषय है।कबीर कहते हैं कि 'ढाई आखर प्रेम जो पढे सो पंडित होय'। मेरा मानना है कि यदि आपको प्रेम का अर्थ नहीं पता तो नहीं पता; जैसे आपको apocalypses का अर्थ नहीं पता तो नहीं पता, इस तथ्य से कौन सी दुनिया नष्ट होने वाली है? खैर, प्रेम बड़ा मुश्किल विषय है।70- 80वीं सदी के सॉफ्ट रॉक (soft rock) गीतकार मानतें है कि प्रेम एक कला (art) है। यह कोई गणित और अकाउन्टन्सी जैसा वस्तुनिष्ठ(objective)नहीं बल्कि आत्मनिष्ठ(subjective) विषय है। प्रेम में 1और1, 2ही नहीं, 11 भी हो सकता है, 1 भी हो सकता है, यहाँ तक कि ज़ीरो भी हो सकता है। या दर्शन कि भाषा में कहूँ तो, यदि आप ज्ञान(Sophy) से प्रेम करते हैं या फिर Sophie नामक किसी प्राणी से दोनों ही स्थिति में आप PHILO-SOPHIE हैं। गणित की ज्यामिति का ज्ञान न होने के बावजूद भी मैं यह कह सकती हूँ कि वर्तमान में प्रचलित प्रेम, जो सरल रेखा में ना हो कर यदि त्रिकोणीय(love triangle) हैं तो यही प्रेम भविष्य के Wreck tangle हैं । इसीलिए प्रेम कि समीकरणों में समाकलन (integration) होना परम आवश्यक है।
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| (फिल्म- इजाज़त) |
प्रेम की अभिव्यक्ति कि रोचक बात उसकी भाषाशैली होती है, कभी-कभी इस अभिव्यक्ति का माध्यम भोजन(food), संगीत(music), किताबें और फूल भी बनते हैं।और चेहरे की शिकन सारी भाषाओं में एक जैसी होती है। यह बात अवश्य है कि भाषों को नए शब्दकोश प्रेम में पड़े लोगों ने ही दिए हैं, आपको इस तथ्य से अवगत करवा दूँ कि प्रेम में संलाप-प्रलाप-अनुलाप-अपलाप आदि होतें हैं। संकोच की बात यह है कि तुतलाहट कैसे किसी युवा प्रीति वाणी बन जाती है? माना कोई व्यक्ति मुँह से तुतलाता है, लेकिन संदेश(message) लिखते समय हाथों से कैसे तुतलाया जा सकता है? घोर असाहित्यिक! सुधी पाठकों इसमे प्रेम पंछियों का कोई दोष नहीं, क्यूंकी ये दुनिया हमारी नहीं बल्कि उसके द्वारा बनाई गई है, इसीलिए इस गड़बड़झाले के लिए केवल वो ही जिम्मेदार है।
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| (21 वीं सदी के वयस्क नायक और नायिका के gibberish संदेश ) |
चूँकि मनुष्य एक साइबर स्पेस में तैर रहा है इसीलिए मल्टीमीडिया का आदान-प्रदान लगा रहता है,परिणामानुसार प्यार का भी व्यापार चलता है। किन्तु प्यार के व्यापार से पहले खुद से ही प्यार किया जाना नितांत आवश्यक है। अर्थात मीरा, रेशम और किम करदेशन(Kim Kardashian) से पहले खुद का प्रेमी/प्रेमिका बनना आवश्यक है, भगवान को ही देख लो- पहले खुद से प्रेम करते हैं तब अपने भक्तों से। इसलिए पहले अपने प्रेम में खुद के लिए गरुड का इंतजाम किया, तब मनुष्य के लिए घोडा बनाया, तब कहीं जाकर हाल ही में 103 साल पहले आदमी को हवाई जहाज बनाने दिया। तो पहले खुद से फिर दूसरों से।
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| (फिल्म-डिअर ज़िंदगी ) |
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| (फिल्म- क्वीन) |
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| (film -call me by your name) |
कभी-कभी यथार्थ और कल्पना के बीच में प्रेमपंछियों पर ग्रेविटी बाइ-डिफ़ॉल्ट कार्य करती है।और ग्रैविटी का कार्य धम से गिराना भी है। जो दर्द का कारण भी होता है। ऐसे में प्रेम में कभी-कभी उदास और आहात दोनों होना पड़ता है; जिसे मोटे अर्थों में समझा जाए तो किसी की उपस्थिति जो फूल की तरह प्रतीत होती थी एवं अब अनुपस्थिति शूल की तरह चुभती है। और फिर प्रेम में शुद्ध 200 kg आँसू और 300 kg गम कि शुरुवात होती है। ऐसे में देवदास बनना तय होता है। और मैं इन्हे देवदास नहीं, D.D the moody कहलाना पसंद करती हूँ। इन D.D the moodyको लगता है कि किसी का चला जाना हृदय पर डेंट(dent) पड़ने जैसा है,जिसमे गर्त और दर्द परमानेंट होता है, और अगर प्यार के व्यापार में कोई आपका महंगा सेंट(scent) लेके चला गया है तो सेंटीमेंट होना जरूरी है। ये DD the moody प्रेम का आतंक फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, वे कहते हैं प्रेम एक रोग है किन्तु असल में दुख एक रोग है। मुझे लगता है कि एक खाली जगह होने में नए स्पेस और टाइम कि आशा होती है जो नए समीकरणों को जन्म देती है। ठीक ग्रैविटी की तरह,जो पूरे यूनिवर्स को संतुलित रखती है। ऐसे में मुझे रिलके( Rainer Maria Rilke) बड़े प्रासंगिक लगते हैं। वे कहते हैं की 'let everything happen to you beauty and terror, just keep going. no feeling is final'
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| (DD the moody) |
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| (film-JoJo rabbit) |
जैसे चलती का नाम गाड़ी होता है ,और हमे जीवन जीने की ऐसी आदत लग गई है कि जीवन भी एक गाड़ी बन गया है। जिसमे सवारी सामान की खुद जिम्मेदार होती है।8-9वीं सदी के सूफी संत और भक्ति संत कहते हैं कि इस संसार में प्रेम सबसे महान है, बाकी तो सब सामान है।क्या इस सामान में से दो लोग एक दूसरे के वेक्यूम क्लीनर नहीं हो सकते? जिसमे एक दूसरे को जैसे हैं वैसे अपनाया जाए,अच्छे और बुरे को भी अपनाया जाए। क्या दो लोग एक दूसरे के गेलविनिक लेप नहीं सकते हैं? जो एक-दूसरे के चरित्र पर जंग ना लगने दें।और बस बाते करते रहें। केवल अंगुलियों से बुनी-बुनाई बातें नहीं बल्कि प्रत्यक्ष रूप में। इधर-उधर कि बातें। यदि भूख लगे तो पनीर में मेंडल के मटर की बात, ईश्वर पर ग्लोबल वार्मिंग के असर की बात,जीवन कि अनिश्चितता में हैजेनबर्ग के सिद्धांत की बात, किसी जिम(gym )में survival of the fittest की बात, प्रेम में Schrödinger के बिल्ली की 'to be or not to be' की बात , अकेलेपन में इलेक्ट्रान के isolation की बात, यातायात के शोर में किशोर कुमार की बात,आनेवाले पल में जानेवाले पल की बात, कल में कल की और आज में कल की बात। ऐसे ही बातों-बातों में कुछ ना कुछ तो बात बन ही जाएगी।
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| (फिल्म- अपू संसार) |
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(फिल्म-बातों बातों में)
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| (फिल्म-मंजिल) |
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| (film-before sunrise) |
अंततः, शुरुवात से लेकर अंत के बीच के स्पेस में बहुत कुछ प्रेम लिखने पर भी असल में मैने जो भी लिखा है प्रेम सरीखा लिखा है ठीक प्रेम नहीं। क्यूंकी ठीक प्रेम तो अभी भी सुस्त राहों पर सुस्त कदमों से चल रहा है-एकदम चौपट! और ग्रैविटी के बारे में सोच रहा है। ग्रैविटी कि तरह constantly, abundantly and dominantly.
_G
Wah didi Kya likhte ho ap 💓👌🏻
ReplyDeleteHilarious as always gunjan...sheer brilliance.
ReplyDeleteVery smooth writting!!
Kuch to bat h tujhme🤔🤔
ReplyDeleteKya likhti h dost tu with fact k sath
Chalo kuch to seekha tune mujhse 😎😎mere contact m bni reh or acha likhti rahegi❤️❣️
Kya baat, kya baat, kya baat 👌👌
ReplyDeleteशब्द नहीं मिल रहे, लगता है तेरी तरह प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ने ही पड़ेंगे।
Bahut hi acha likha hai wakai hi prem ki ek pahal ko alag najariye se wyakt kiya hain. God bless you Gunjan bachha❤
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