AALAS AUR OVERTHINKING kA DARSHAN
क्या आलसी व्यक्ति भी कभी ब्लॉग लिख सकता है? असंभव ना?
उतना ही असंभव और अविश्वसनीय जितना कि बीथोवेन(Beethoven) हारमोनियम पर सिम्फनी(symphony) बजाते हुए पाए गए और तानाशाह हिटलर टूथ्ब्रश मूँछों (toothbrush moustache) को छोड़कर गोटी(goatee- एक प्रकार की दाढ़ी का फैशन ) रखते हुए पाए गए| खैर आलसी आलसी में फर्क होता है| इन्हे मानकों के अनुरूप अलग- अलग नामों जैसे ढीठ, निठल्ला और कामचोर में बाँटा जाता है|
किन्तु शोध से मुझे पता चला है कि मैं कुछ भिन्न किस्म की आलसी हूँ; मतलब आलस्य के साथ-साथ ओवरथिंकिंग का भी जुनून मेरे भीतर है| ओवरथिंकिंग को मौटे-मौटे अर्थों में समझा जाए तो, इंसानी दिमाग में हवाई किले बनाना, फिर उसे अच्छे से सजाना, और एक दिन अच्छा-सा मुहूरत देख के हवाई किलों को तोड़ देना और सलीके से मातम भी खुद ही मानना होता है| यह काम मैं घंटों बैठकर करती हूँ, और सच माने तो मैं इसे काम ही समझती हूँ| अगर घंटों भगवान की पूजा करना काम हो सकता है तो फिर ओवरथिंकिंग क्यूँ नहीं?
वैसे भी इतिहास गवाह है कि आलसी ओवेरथीनकर्स(overthinkers) ने प्रत्येक क्षेत्र में अंधाधुंध शोचनीय कार्य किए हैं, ऐसे ही विज्ञान के क्षेत्र में इनके द्वारा बड़े आविष्कार किए गए हैं| कहा जाता है कि "आवश्यकता आविष्कार कि जननी है|" और मेरा मानना है कि 'आलस्य आवश्यकता का बाप है' ऐसे में आलस्य और आविष्कार के बीच नाना-नातिन का संबंध हुआ; मतलब आविष्कार आलसियों के लिए या उनके द्वारा किए जाते हैं| जैसे की आप न्यूटन को ही ले लीजिए,अगर वे भी बाकी सबकी तरह आलसी न होते तो पेड़ से गिरे सेब पर कब का लपक जाते और कहाँ गुरुत्वाकर्षण के बारे में सोच पाते, इसी प्रकार आर्कमिडीज को ही ले लीजिए,अगर वे भी सबकी तरह फास्ट फॉरवर्ड होते तो जल्दी से पूल से बाहर आ जाते और कहाँ तैरने के नियम के विषय में सोच पाते?
अब जहां आलसी होतें हैं वहीं जरूरत से अधिक कार्मिक लोग भी| जो दिन रात गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हैं| वे खुद की पीठ पर बेताल बनकर बैठे रहतें हैं| मुझे इनसे डर तो लगता ही है किन्तु इन लोगों को देखकर मुझे कर्म से अरुचि-सी होने लगी है| मेरा मानना है कि कुछ काम करने से कुछ अच्छा होता है और कुछ बुरा, कुछ न करने से कुछ भी बुरा नहीं होता| तो बस दुनिया के लिए अच्छा सोचते जाओ|
वैसे भी ख्यालों से दुनिया चलती है और ख्यालों के भी स्कूल होते हैं जिन्हे Schools of Thoughts कहते हैं| क्यूंकी मैं आस-पास के सर्कस से ऊब गईं हूँ तो मैंने सब अच्छा सोच डाला है| मैंने देश से गरीबी मिटा दी है, पर्यावरण से प्रदूषण हटा दिया है, प्रत्येक बच्चे को फोन दे दिया है, हफ्ते में सोमवार को छुट्टी कर दी है ,सभी प्रेम करने वालों को मिला दिया है अब कोई विरह का राग नहीं गाता| हाँ,ये बात अलग है कि ट्रैजडी(tragedy) और दुख भरे गीत लिखने वाले मुझे कोस रहें हैं|
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| (सोच रहीं हूँ की इस कुर्सी ने जीवन भर क्या किया होगा?) |
इतना सब सोचने के बाद मेरे पास कुछ भी करने को बचा नहीं, तो मैं केवल नींद पर फोकस करती हूँ;Full HD में सपने देखती हूँ| अब में अपनी जगह से उठने के लिए केवल नींद पर ही भरोसा करती हूँ| इर्द-गिर्द कि आपाधापी से दूर मुझे चीजों को टालना अच्छा लगने लगा है और शायद यह लेख भी मेरे टलते हुए कार्यों और बातों का ही प्रतिबिंब है, क्यूंकी मुझे लगता है कि चीजें टलती रहेंगी तो शायद वे अपने आप ही सुलझ जाएंगी|
_ G




Wow👌
ReplyDeleteGunjan kuch to baat hai tujh mein!! Very very Good writing man!!
ReplyDeleteBhut acha likha h apne!! Apki creativity shandar h..!!
ReplyDeleteStarting से end तक आपके शब्दोें का चयन, इस विषय पर आपका दृष्टिकोण सराहनीय है, अपनी बात आप निडरता से रखती है ये गुण एक अच्छे लेखक के ही हो सकते हैं।
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर लिखावट 😍😍
कवि बच्चे को रुलाएगी क्या पागल!!
Deleteहाहाहाहा..कवि मैंने तेरा कमेन्ट पढ़ने के बाद दो या तीन बार आंखे पानी से धोई हैं ।
Deleteअरे गज़ब, आलसी लोग ही ऐसा लिख सकते भगवान आपको और आलस दे 👻👻
ReplyDeleteआलसी हो कर भी बार बार wallpaper बदलना अपने आप में ही बहुत बड़ी उपलब्धि है
ReplyDeleteThanks man!
Deleteआपका username जिसने भी दिया होगा, वो बहुत बड़ा दूरदर्शी इंसान होगा।
Very good writing shankhi didi.
ReplyDeleteAap hi ne btaya tha -Jo kuch nhi karte wo kamal karte Hain...very good shankhi Di.
ReplyDeleteWaah.. Kya khoob likha hai.. Har koi active rhne ke bindu btata rehta hai.. Aaj mujhe aalsi hone ke fayde bhi pta chal gaye.. Ab mai faisla kr skti hu :)
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