आषाढ़ के तीस दिन
{ प्राक्कथन : फिर एक बार फिर से वही शुरुआत। मैं नहीं जानती की आप क्या समझ रहें हैं कि पलाश बाबू कौन हैं? आप बस सोचते हैं कि वे इस लेख में एक निर्धारित इकाई हैं। नायक, प्रस्तुतकर्ता या कुछ और। यद्यपि पलाश बाबू एक काल्पनिक किरदार हैं ;लेकिन पलाश बाबू के संबंध में इतना कहना काफी होगा कि सड़क के फुटपाथ पर जिस आदमी से अचानक आप टकरा जाते हैं, वो आदमी पलाश बाबू है। आप सिर्फ घूर के उन्हें देख लेते हैं; उसके अलावा आप उनसे मतलब नहीं रखते। क्यूंकी जाहिर सी बात है कि पलाश बाबू भी आपसे मतलब नहीं रखते। टकराने के क्षण में आप पलाश बाबू के लिए वही होते हो जो पलाश बाबू आपके लिए। इंसानी सभ्यता के होने के नाते आप में और पलाश बाबू में कुछ समानता हो सकती है। वही समानता आप में या किसी-और में ; किसी और में या मुझमे भी हो सकती है। इसीलिए पलाश बाबू जिस जगह बैठे हैं, वहाँ उनकी जगह आप भी हो सकते थे। बहरहाल इस गणित की पहेली में कुछ नहीं रखा है। बात इतनी सी है कि विभाजित होकर पलाश बाबू किसी न किसी अंश में आप में से हर एक व्यक्ति में हैं।} शहर के एक पॉश इलाके में पलाश बाबू अ...