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154वीं

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                                                                      विगत दिनों में मुझे खादी खरीदने का अवसर प्राप्त हुआ। खादी की दुकान पर 'गांधी आश्रम' का बोर्ड लगा था। एक आयताकार काउन्टर था । पीछे मध्यकालीन युग की कुर्सी, अलमारीयों में खादी के थान, कोसा, साड़ियाँ और कुछ गद्दे रखे थे। शाम के 7 ही बजे थे कि काउन्टर के पीछे एक आदमी सुस्त झुका हुआ था। उसने टेरेलीन की शर्ट और स्ट्रेट लेंथ की पेंट पहनी थी। लेकिन बेच वो खादी रहा था। ठीक सामने खादी रंग की दीवार पर नॉन-वॉइलेन्स के सबसे बड़े इंफ्लुएंसर महात्मा गांधी की बड़ी-सी तस्वीर लगी हुई थी। तस्वीर के पीछे एक लंबी-सी गेहूँए रंग की  छिपकली चुप-चाप फोटो के गस्त लगा रही थी। जैसे ही कोई किट-पतंगा उसके पास से गुजर रहा था; तो छिपकली उसे चुप-चाप दबोच लेती थी और एकदम स्थायी भाव से बापू की फोटो के पीछे छुप जाती थी। वह दृश्य ठीक उसी प्रकार था जैसे- बड़े नेता, सियासतदार और बापू...