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बातों बातों में: इधर उधर की बातों की विशेष शृंखला

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  भाग 2: 'आवाज़ भी एक जगह है ' 13 April '23 'चलते चले जाना' उतना आसान नहीं जितना मैं पहले समझती थी।चलते रहने के यूनिवर्सल नियम का पालन करते हुए हताशा से बैठ जाती हूँ, और सोचती हूँ कि कितना सरल होता जीवन में चलते चले जाने का अर्थ यदि दिशायें चारों तरफ नहीं बल्कि एक तरफ होती और केवल हम चलते होते, बाकी सब रुका होता। जैसे- ढाई चलान में शतरंज का घोड़ा नाप लेता है अपना पूरा ब्लॉक। लेकिन ढेर सारी चालें चलने पर भी मुझसे नापे नहीं नपता ये संसार। इस आने-जाने के बीच में खुद से अनजाने होने का फ़ासला होता है। जीवन की इस आपाधापी में बाहर से यात्री होना चाहती हूँ और भीतर से बुद्ध बनना चाहती हूँ। इसलिए यात्री मन पर बुद्ध का दुशाला ओड़े चलती रहती हूँ। ऐसे में मेरे मन के सारे प्रश्नों के उत्तर पलायन कर जाते हैं। शेष हाथ लगते हैं कुछ संवाद। संवाद -खालीपन के साथ। जिनमे खाली कुछ भी नहीं होता क्यूंकी ये संवाद नए प्रश्नों से भरे होते हैं।   (चलते चले जाना) मसलन, कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक कि- 'संसार में क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जाएंगे?' अब इस प्रश्न का उत्तर अधिकांश बुद्धिज...